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महादेव और माता पार्वती का दिव्य एवं अलौकिक विवाह प्रसंग

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जगदलपुर (✍️विमलेंदु शेखर झा):    महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य विवाह का स्मरण श्रद्धालुओं के हृदय को भक्त...

जगदलपुर (✍️विमलेंदु शेखर झा):    महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य विवाह का स्मरण श्रद्धालुओं के हृदय को भक्ति और आस्था से भर देता है। यह केवल एक वैवाहिक प्रसंग नहीं, बल्कि तप, त्याग, समर्पण और अटूट प्रेम की अद्भुत गाथा है।

राजा दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर सती ने देह त्यागते समय भगवान शिव से वर माँगा था कि जन्म-जन्मांतर तक उनका स्नेह शिव चरणों में बना रहे। उसी वरदान के फलस्वरूप सती ने हिमालय और मैना के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया। उनके जन्म से हिमालय की शोभा अद्भुत हो उठी वन-उपवन, फल-फूल और रत्नों की खानें प्रकट हो गईं।

देवर्षि नारद ने हिमवान को भविष्यवाणी सुनाई कन्या सर्वगुण सम्पन्न है, पर उसका विवाह एक योगी, जटाधारी, अमंगल वेषधारी से होगा। माता-पिता चिंतित हुए, किंतु पार्वती मन ही मन प्रसन्न थीं, क्योंकि वे शिव को ही अपने पति के रूप में स्वीकार चुकी थीं।

पार्वती ने शिव को पाने के लिए घोर तप किया वर्षों तक केवल मूल, फल और बेलपत्र पर जीवन यापन किया। अंततः पत्तों का भी त्याग कर दिया, तब वे ‘अपर्णा’ कहलायीं। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर आकाशवाणी हुई कि उनका संकल्प पूर्ण होगा।

उधर भगवान शिव, सती-वियोग में समाधिस्थ होकर श्रीराम नाम का जप कर रहे थे। इसी समय स्वयं राम प्रकट होकर शिव को पार्वती से विवाह का संदेश देते हैं। शिव आज्ञा स्वीकार करते हैं।

देवताओं को तारकासुर से मुक्ति हेतु शिव-पुत्र की आवश्यकता थी। ब्रह्मा ने उपाय बताया कि शिव-विवाह आवश्यक है। शिव की समाधि भंग करने के लिए कामदेव को भेजा गया। कामदेव ने वसंत ऋतु और पुष्पबाणों से वातावरण मोहक बना दिया, परंतु शिव की तपस्या अडिग रही।

क्रोधित होकर शिव ने तीसरा नेत्र खोला और कामदेव भस्म हो गए। रति के विलाप पर शिव ने वर दिया कि कामदेव ‘अनंग’ रूप में सर्वत्र विद्यमान रहेंगे।

शिव की बारात अद्वितीय थी। देवताओं के साथ भूत-प्रेत, पिशाच, योगिनी और गण सम्मिलित थे। स्वयं विष्णु और ब्रह्मा भी बाराती बने।

शिव का स्वरूप—जटाजूट, भस्म-विभूति, नागों का आभूषण, गले में मुण्डमाला और हाथ में त्रिशूल—देखकर माता मैना भयभीत हो उठीं। उन्होंने पार्वती का विवाह रोकने का विचार किया। किंतु पार्वती अडिग रहीं—“मैं शिव को ही पति रूप में स्वीकार करूंगी, अन्यथा जीवन भर अविवाहित रहूँगी।”

नारद और सप्तर्षियों ने मैना को समझाया कि पार्वती स्वयं आदिशक्ति हैं और शिव उनके अर्धांग। अंततः शुभ मुहूर्त में वेद-विधि से शिव-पार्वती का विवाह सम्पन्न हुआ। देवताओं ने पुष्पवर्षा की, मंगलध्वनि गूँजी और सृष्टि संतुलन की दिशा में अग्रसर हुई।

इस दिव्य मिलन से आगे चलकर भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ, जिन्होंने तारकासुर का वध कर देवताओं को मुक्त किया।

महाशिवरात्रि हमें सिखाती है

तप और धैर्य से असंभव भी संभव होता है।

बाहरी स्वरूप नहीं, आंतरिक तत्व और सत्य का महत्व है।

अटूट श्रद्धा और समर्पण ही जीवन का परम साधन है।

भगवान शिव और माता पार्वती का यह पावन विवाह प्रसंग सनातन संस्कृति में प्रेम, शक्ति और संतुलन का प्रतीक है।

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