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लोकतंत्र और आर्थिक विकास मजबूत राष्ट्र निर्माण की बुनियाद

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रायपुर (छत्तीसगढ़): भारत की आज़ादी को 77 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं, लेकिन स्वाधीनता और लोकतंत्र के वास्तविक मूल्यांकन का प्रश्न आज भी प्रासंगिक...

रायपुर (छत्तीसगढ़):

भारत की आज़ादी को 77 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं, लेकिन स्वाधीनता और लोकतंत्र के वास्तविक मूल्यांकन का प्रश्न आज भी प्रासंगिक बना हुआ है। लोकतंत्र केवल शासन प्रणाली नहीं, बल्कि किसी भी राष्ट्र के आर्थिक, सामाजिक और मानवीय विकास का सशक्त पैमाना है। विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक विकास के बिना लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत आधार स्तंभ नहीं बन सकती।

स्वतंत्रता के बाद भारत ने एक समावेशी और संवैधानिक लोकतंत्र की स्थापना को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। मजबूत वित्तीय प्रबंधन और संवैधानिक मूल्यों की जुगलबंदी ही देश के चहुमुखी विकास को मूर्त रूप दे सकती है। हालांकि, आज भी सामाजिक आर्थिक विषमता, गरीबी, बेरोज़गारी, जातिवाद और क्षेत्रीय असमानताएं देश की प्रगति में बड़ी बाधा बनी हुई हैं।

देश में राष्ट्रीय संपत्ति की तोड़फोड़, आपसी असहमति में हिंसा और सामाजिक तनाव जैसे घटनाक्रम विकास के लिए शुभ संकेत नहीं माने जा सकते। ऐसे में एक सशक्त आंतरिक नीति, सामाजिक सौहार्द और आपसी विश्वास का वातावरण बनाना समय की आवश्यकता है। भारत की विदेश नीति ने वैश्विक मंच पर देश की पहचान को मजबूत किया है, लेकिन केवल अंतरराष्ट्रीय संबंधों से ही 141 करोड़ नागरिकों का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है।

विशेषज्ञों के अनुसार, गरीबी उन्मूलन के लिए केवल मुफ्त अनाज वितरण पर्याप्त नहीं है। इसके साथ-साथ रोजगार, आजीविका के साधन, कौशल विकास और आत्मनिर्भर उत्पादन व्यवस्था को बढ़ावा देना अनिवार्य है। पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान एवं तकनीक जैसे क्षेत्रों में कई प्रयास किए गए, लेकिन योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन और संसाधनों के समुचित उपयोग की कमी अब भी एक बड़ी चुनौती है।

भारत जैसे बहुधार्मिक और सांस्कृतिक विविधता वाले देश में धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक सौहार्द लोकतंत्र की आत्मा हैं। इसके बावजूद जातिवाद और सांप्रदायिकता आज भी सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित कर रहे हैं। स्वतंत्रता संग्राम के महान नेताओं ज्योतिबा फुले, महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव अंबेडकर के प्रयासों के बाद भी जाति-आधारित भेदभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हो सका है, जिसका राजनीतिक लाभ भी लिया जाता रहा है।

आतंकवाद और नक्सलवाद जैसी समस्याएं भी देश की आंतरिक सुरक्षा और विकास के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई हैं। कश्मीर से लेकर मध्य भारत तक फैली ये समस्याएं केवल भारत तक सीमित नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्वरूप ले चुकी हैं। सरकार द्वारा इन पर नियंत्रण के प्रयास लगातार जारी हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में स्वच्छ भारत अभियान, श्रम कानून सुधार, पंचायती राज में संशोधन और आर्थिक सशक्तिकरण जैसे कदम उठाए गए हैं। स्वच्छता, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के विकास की दिशा में प्रगति हुई है, लेकिन शत-प्रतिशत अनुपालन अब भी लक्ष्य बना हुआ है।

कुल मिलाकर, “नवीन भारत” की संकल्पना को साकार करने के लिए लोकतंत्र को आर्थिक मजबूती, सामाजिक समानता, शांति और आत्मनिर्भरता के साथ जोड़ना आवश्यक है। योजनाओं का पारदर्शी और प्रभावी क्रियान्वयन ही वह रास्ता है, जिससे भारत न केवल आंतरिक रूप से सशक्त बनेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर सकेगा।

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