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शानी जी की जयंती पर साहित्यिक गोष्ठी आयोजित, रचना संसार पर हुई गहन चर्चा

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जगदलपुर:  हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध कथाकार एवं लेखक शानी की जयंती के अवसर पर 16 मई को प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा स्थानीय लाला जगदलपुरी केन्द...

जगदलपुर: हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध कथाकार एवं लेखक शानी की जयंती के अवसर पर 16 मई को प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा स्थानीय लाला जगदलपुरी केन्द्रीय पुस्तकालय परिसर स्थित जिला ग्रंथालय में विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में साहित्यकारों, लेखकों और रंगकर्मियों ने शानी जी के साहित्यिक योगदान को याद करते हुए उनके रचना संसार पर विस्तार से चर्चा की।

कार्यक्रम का शुभारंभ शानी जी के चित्र पर पुष्प अर्पित कर किया गया। गोष्ठी का संचालन करते हुए साहित्यकार जगदीश चन्द्र दास ने कहा कि शानी भारतीय जनजीवन के संवेदनशील और कुशल चितेरे थे, जिनकी रचनाओं में समाज की गहरी समझ दिखाई देती है।

डॉ. योगेन्द्र मोतीवाला ने कहा कि शानी ने ग्रामीण, जनजातीय और महानगरीय जीवन को समान संवेदनशीलता के साथ अपनी रचनाओं में उकेरा। उन्होंने विशेष रूप से शानी की चर्चित कृति “शाल वनों का द्वीप” का उल्लेख करते हुए कहा कि अबूझमाड़ और ओरछा के जनजातीय जीवन का अत्यंत जीवंत चित्रण उसमें देखने को मिलता है।

नवोदित लेखक दीपक थवानी ने शानी जी के जीवन संघर्ष और उनकी विशिष्ट लेखन शैली पर प्रकाश डालते हुए उनकी चर्चित कहानी “युद्ध” का उल्लेख किया। वहीं डॉ. सुनील श्रीवास्तव ने कहा कि शानी आत्मप्रशंसा से दूर एक विशाल व्यक्तित्व के धनी लेखक थे। उन्होंने शानी के प्रसिद्ध उपन्यास “काला जल” के पात्र मोहसिन, बब्बन और सालिहा आपा का विशेष उल्लेख किया।

कवयित्री एवं समीक्षक ख़ुदेजा ख़ान ने शानी की चर्चित कहानी “बिरादरी” का विश्लेषण करते हुए कहा कि यह कहानी भारतीय मुस्लिम समाज में व्याप्त पाखंड और दिखावे को प्रभावशाली ढंग से सामने लाती है। वरिष्ठ साहित्यकार मदन आचार्य ने शानी के कथेतर साहित्य, एकांकी नाटक और “गुलाब में रफ़ू” जैसी रचनाओं पर अपने विचार व्यक्त किए।

डॉ. राजेश सेठिया ने कहा कि शानी की प्रारंभिक रचनाओं में प्रेम और कल्पना का प्रभाव दिखाई देता है, जबकि बाद की रचनाएं यथार्थ और प्रामाणिक अनुभवों पर आधारित हैं। उन्होंने उपन्यास “सांप और सीढ़ी” के पात्र “धान माँ” को अत्यंत विशिष्ट बताया।

वरिष्ठ रंगकर्मी एवं आकाशवाणी के पूर्व उद्घोषक एम.ए. रहीम ने हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक डॉ. धनंजय वर्मा और शानी जी की आत्मीय मित्रता का उल्लेख करते हुए उस दौर की साहित्यिक गतिविधियों को याद किया।

कार्यक्रम में प्रकाश चन्द्र जोशी, विक्रम सोनी एवं सहायक प्राध्यापक ललिता लहरी सहित अनेक साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। आयोजन को सफल बनाने में पुस्तकालय प्रबंधन की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

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