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बंदूक से वॉलीबॉल तक: सुकमा पुनर्वास केंद्र में बदल रही जिंदगी की तस्वीर

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भारत माता की जय के नारों से गूंजा परिसर, मुख्यधारा में लौटे 113 युवाओं के जीवन में आया नया सवेरा रायपुर/सुकमा:    कभी नक्सलवाद के प्रभाव में...

भारत माता की जय के नारों से गूंजा परिसर, मुख्यधारा में लौटे 113 युवाओं के जीवन में आया नया सवेरा

रायपुर/सुकमा:   कभी नक्सलवाद के प्रभाव में जंगलों की कठिन जिंदगी जीने वाले युवाओं के जीवन में अब उम्मीद, शिक्षा और आत्मनिर्भरता की नई किरण दिखाई दे रही है। सुकमा जिला प्रशासन द्वारा संचालित जिला पुनर्वास केंद्र में रह रहे 113 आत्मसमर्पित युवाओं ने यह साबित कर दिया है कि अवसर और सही मार्गदर्शन मिलने पर बदलाव संभव है। पुनर्वास केंद्र में पहली बार युवाओं द्वारा लगाए गए “भारत माता की जय” के गगनभेदी नारों ने न केवल उनके भीतर आए सकारात्मक परिवर्तन को दर्शाया, बल्कि सुकमा के बदलते सामाजिक परिवेश की भी मजबूत तस्वीर पेश की।

अनुशासन, शिक्षा और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम:

पुनर्वास केंद्र में 42 महिलाएं और 71 पुरुष रह रहे हैं, जिनकी दिनचर्या अब पूरी तरह अनुशासित और रचनात्मक हो चुकी है। सुबह बागवानी और स्वच्छता कार्यों से दिन की शुरुआत होती है, वहीं सामूहिक रूप से भोजन तैयार करने की जिम्मेदारी भी युवा स्वयं निभाते हैं। प्रशासन ने इनके शैक्षणिक विकास के लिए दो विशेष शिक्षकों की नियुक्ति की है, जो प्रतिदिन अक्षर ज्ञान, गणित और अंग्रेजी की शिक्षा दे रहे हैं। साथ ही आधार कार्ड, राशन कार्ड, आयुष्मान कार्ड, श्रम कार्ड और मतदाता पहचान पत्र जैसे आवश्यक दस्तावेज प्राथमिकता के आधार पर तैयार किए जा रहे हैं, ताकि ये युवा समाज की मुख्यधारा में सम्मानपूर्वक शामिल हो सकें।

हथियार नहीं, अब हाथों में वॉलीबॉल:

पुनर्वास केंद्र की सबसे प्रेरक तस्वीर खेल मैदान से सामने आई है। युवाओं की पसंद जानने पर अधिकांश ने वॉलीबॉल को चुना। इसके बाद प्रशासन ने खेल गतिविधियों की शुरुआत की, जिसमें युवाओं ने पूरे उत्साह के साथ भाग लिया। कभी हथियार उठाने वाले हाथ अब वॉलीबॉल कोर्ट में शानदार खेल का प्रदर्शन कर रहे हैं। ओयाम जोगा, वेको हुंगा और सोड़ी सोमड़ी जैसे युवाओं ने खेल के माध्यम से अपनी नई पहचान बनाई है। मैदान में उनकी ऊर्जा और आत्मविश्वास देखकर यह स्पष्ट होता है कि जीवन ने उनके लिए नई दिशा चुन ली है।

5G स्मार्टफोन से डिजिटल दुनिया से जुड़ाव:

सिर्फ शिक्षा और खेल ही नहीं, बल्कि डिजिटल सशक्तिकरण पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। जिला प्रशासन ने सभी युवाओं को 5G स्मार्टफोन उपलब्ध कराए हैं, जिससे वे देश-दुनिया की जानकारी प्राप्त कर सकें और आधुनिक तकनीक से जुड़ सकें। शाम के समय संगीत कक्ष में आयोजित सांस्कृतिक गतिविधियां उनके मानसिक और भावनात्मक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। गीत-संगीत और सामूहिक सहभागिता ने उनके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार किया है।

पुनर्वास का बन रहा राष्ट्रीय मॉडल:

सुकमा का यह पुनर्वास केंद्र केवल एक आश्रय स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की एक जीवंत प्रयोगशाला बनकर उभरा है। शिक्षा, कौशल विकास, खेल, डिजिटल सशक्तिकरण और संवेदनशील प्रशासनिक पहल के माध्यम से यह मॉडल यह संदेश दे रहा है कि भटके हुए युवाओं को अवसर और विश्वास दिया जाए तो वे राष्ट्र निर्माण के मजबूत सहभागी बन सकते हैं। सुकमा की यह कहानी केवल पुनर्वास की नहीं, बल्कि उम्मीद, विश्वास और नए भारत की उस सोच की कहानी है, जहां बंदूक छोड़कर युवा विकास, खेल और राष्ट्र निर्माण का रास्ता चुन रहे हैं।

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