नलकालीन शिवालय से जुड़ा है देवड़ा के झाड़ेश्वर महादेव का इतिहास, 16वीं सदी के अभिलेख में मिलता है ‘दानेश्वर शिवालय’ का उल्लेख जगदलपुर। बस्...
नलकालीन शिवालय से जुड़ा है देवड़ा के झाड़ेश्वर महादेव का इतिहास, 16वीं सदी के अभिलेख में मिलता है ‘दानेश्वर शिवालय’ का उल्लेख
जगदलपुर। बस्तर की धरती केवल प्राकृतिक सौंदर्य और आदिवासी संस्कृति के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी प्राचीन धार्मिक एवं ऐतिहासिक विरासत के लिए भी देशभर में विशिष्ट पहचान रखती है। इसी विरासत में जगदलपुर के समीप तिरिया-माचकोट के वन क्षेत्र में स्थित देवड़ा का झाड़ेश्वर महादेव मंदिर महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इतिहास के जानकारों के अनुसार यहां स्थापित शिवलिंग को छठवीं-सातवीं सदी का माना जाता है और यह मंदिर बस्तर की प्राचीन शैव साधना की निरंतर परंपरा का साक्षी है।
इतिहास के सहायक प्राध्यापक ओम प्रकाश सोनी के अनुसार सातवीं-आठवीं सदी के दौरान बस्तर क्षेत्र में नल राजवंश का प्रभाव था। उस समय बस्तर शैव साधना के प्रमुख केंद्रों में गिना जाता था। क्षेत्र में अनेक शिवालयों का निर्माण हुआ, जिनमें गोबरहीन, केशकाल, गढ़धनोरा, दंतेवाड़ा, रामपाल और देवड़ा प्रमुख रहे हैं। इन प्राचीन शिवालयों में देवड़ा का शिवधाम आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
देवड़ा के झाड़ेश्वर महादेव की ऐतिहासिक महत्ता केवल प्राचीन शिवलिंग तक सीमित नहीं है। उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि यह शिवालय मध्यकाल में भी धार्मिक आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र था। ओम प्रकाश सोनी के मुताबिक 16वीं सदी में चक्रकोट यानी बस्तर के राजा राणक जयसिंह देव काकतीय ने देवड़ा के दानेश्वर महादेव मंदिर को जम्बू गांव अर्पित किया था।
इसका प्रमाण केसरपाल गांव से प्राप्त अभिलेख में मिलता है। अभिलेख में देवड़ा के शिव मंदिर का उल्लेख ‘दानेश्वर शिवालय’ के रूप में किया गया है। कालांतर में यही नाम परिवर्तित होकर ‘झाड़ेश्वर शिव’ के रूप में प्रचलित हुआ। वर्तमान में जम्बू गांव को जाम गांव के नाम से जाना जाता है। बताया जाता है कि राजा जयसिंह देव द्वारा जाम गांव से प्राप्त आय मंदिर को अर्पित की गई थी।
इतिहासकारों के अनुसार देवड़ा के शिवालय को ‘दानेश्वर शिव’ नाम प्राचीन काल से ही प्राप्त रहा हो, इसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। बाद के कालखंड में स्थानीय परंपरा और उच्चारण के बदलाव के साथ दानेश्वर नाम झाड़ेश्वर के रूप में प्रसिद्ध हुआ। इस प्रकार आज का झाड़ेश्वर महादेव मंदिर अपने भीतर प्राचीन नलकाल से लेकर मध्यकालीन बस्तर तक की धार्मिक परंपरा को समेटे हुए है।
ओम प्रकाश सोनी बताते हैं कि जयसिंह देव काकतीय 16वीं सदी में पुरुषोत्तम देव के बाद चक्रकोट-बस्तर के राजा हुए थे। उनके काल से जुड़े अभिलेख से यह स्पष्ट होता है कि नलकाल में स्थापित शिवालयों की धार्मिक परंपरा मध्यकाल तक भी निरंतर बनी रही।
देवड़ा के इतिहास को प्रमाणित करने वाले प्रमुख साक्ष्यों में राजा जयसिंह देव काकतीय से संबंधित अभिलेख भी शामिल है। विशेष महत्व की बात यह है कि बस्तर में काकतीय वंश से संबंधित यह पहला और एकमात्र ज्ञात अभिलेख माना जाता है। वर्तमान में यह ऐतिहासिक अभिलेख जगदलपुर संग्रहालय में सुरक्षित है।
अभिलेख में राजा के वंश का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, लेकिन इसकी भाषा और शैली के आधार पर इसे 16वीं सदी के राजा जयसिंह देव से संबंधित माना गया है। यही अभिलेख देवड़ा के शिवालय और मध्यकालीन बस्तर के धार्मिक-सामाजिक इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।
देवड़ा का झाड़ेश्वर महादेव मंदिर आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है, लेकिन इसकी महत्ता इससे कहीं व्यापक है। यह स्थल बस्तर की प्राचीन शैव परंपरा, नलकालीन धार्मिक विरासत और मध्यकालीन ऐतिहासिक निरंतरता का जीवंत प्रमाण है।
दानेश्वर से झाड़ेश्वर तक की यह ऐतिहासिक यात्रा बस्तर की उस गौरवशाली परंपरा को सामने लाती है, जिसमें सदियों से शिव उपासना की धारा निरंतर प्रवाहित होती रही है। ऐसे ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थलों का संरक्षण, दस्तावेजीकरण और व्यापक प्रचार-प्रसार आवश्यक है, ताकि बस्तर की इस अनमोल विरासत से आने वाली पीढ़ियां भी परिचित हो सकें।
देवड़ा का झाड़ेश्वर महादेव इसलिए केवल एक प्राचीन मंदिर नहीं, बल्कि बस्तर के इतिहास में सदियों से जीवित शिव आराधना की परंपरा का साक्षात प्रमाण है।



No comments