जगदलपुर (विमलेंदु शेखर झा): बस्तर की पहचान और छत्तीसगढ़ के सबसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में से एक चित्रकोट वाटरफॉल, जिसे देश-विदेश में ‘मिनी ...
जगदलपुर (विमलेंदु शेखर झा):
बस्तर की पहचान और छत्तीसगढ़ के सबसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में से एक चित्रकोट वाटरफॉल, जिसे देश-विदेश में ‘मिनी नियाग्रा’ के नाम से जाना जाता है, इस वर्ष गर्मी की शुरुआत में ही सूखने की कगार पर पहुंच गया है। जलप्रपात का मुख्य स्रोत इंद्रावती रिवर में पानी का स्तर अत्यंत कम होने से प्रपात की धार कमजोर पड़ गई है। इसके चलते यहां पहुंचने वाले पर्यटक निराश होकर लौटने को मजबूर हैं।
स्थानीय जानकारों के अनुसार छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच इंद्रावती नदी के जल उपयोग को लेकर ठोस और प्रभावी समझौते का अभाव इस समस्या की बड़ी वजह माना जा रहा है। पिछले वर्ष राजनीतिक पहल, बुद्धिजीवियों और “इंद्रावती बचाओ अभियान” के प्रयासों से ओडिशा के जोरा नाला से दो धाराओं में पानी का प्रवाह बनाए रखने तथा गर्मी के मौसम में दोनों राज्यों द्वारा 50-50 प्रतिशत पानी उपयोग करने पर सहमति बनी थी। इसके बावजूद बीते वर्ष भी गर्मियों में नदी लगभग सूख गई थी और इस बार तो मार्च की शुरुआत से ही जलप्रवाह बेहद कम हो गया है।
पर्यटकों में निराशा.
जलप्रपात देखने आए पर्यटकों को इस बार निराशा हाथ लग रही है। आंध्र प्रदेश से आए एक दंपति ने बताया कि कुछ वर्ष पहले वे अप्रैल के अंतिम सप्ताह में यहां आए थे, तब जलप्रपात की कई धाराएं देखने लायक थीं। लेकिन इस बार पानी लगभग समाप्त होने की स्थिति में है। वहीं ओडिशा के कोरापुट से आए पर्यटकों ने भी कहा कि वर्तमान स्थिति देखकर उन्हें यहां आना व्यर्थ लगा और वे फिलहाल अपने परिचितों को चित्रकूट आने की सलाह नहीं देंगे।
विधायक ने बताया गंभीर विषय
इस मुद्दे पर विधायक विनायक गोयल ने कहा कि चित्रकोट जलप्रपात का सूखना बेहद गंभीर मामला है। इस संबंध में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से भी चर्चा की गई है और उन्होंने इस दिशा में जल्द सकारात्मक पहल का आश्वासन दिया है। विधायक गोयल ने इंद्रावती नदी पर कई स्थानों पर बैराज निर्माण की आवश्यकता भी बताई। उनके अनुसार बैराज बनने से आसपास के सैकड़ों गांवों को जल सुविधा मिलेगी और किसानों की खेती-किसानी को भी बड़ा लाभ होगा।
पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर खतरा
चित्रकोट जलप्रपात बस्तर क्षेत्र का प्रमुख पर्यटन केंद्र है, जहां देश के साथ-साथ विदेशी पर्यटक भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। जलप्रवाह कम होने से न केवल पर्यटकों की निराशा बढ़ रही है, बल्कि क्षेत्र के पर्यटन उद्योग और स्थानीय लोगों की आय पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते जल प्रबंधन और अंतरराज्यीय समन्वय पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो बस्तर की पहचान बने इस प्राकृतिक धरोहर का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है।


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