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कृषि विज्ञान केंद्र नारायणपुर की किसानों से अपील—खरीफ से पहले करें ढैंचा, सनई जैसी हरी खाद फसलों का उपयोग

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नारायणपुर:  रासायनिक उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता से खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, वहीं मिट्टी की उर्वरता और जैविक कार्बन में कमी किसानों के...

नारायणपुर: रासायनिक उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता से खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, वहीं मिट्टी की उर्वरता और जैविक कार्बन में कमी किसानों के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है। ऐसे समय में हरी खाद (ग्रीन मैन्योरिंग) किसानों के लिए कम लागत, पर्यावरण अनुकूल और टिकाऊ खेती का प्रभावी विकल्प बनकर उभरी है। कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके), नारायणपुर ने किसानों से खरीफ सीजन से पहले हरी खाद का उपयोग करने की अपील की है।

विशेषज्ञों के अनुसार ढैंचा, सनई, मूंग और उड़द जैसी फसलें हरी खाद के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती हैं। इनकी बुवाई मई-जून में कर 45 से 50 दिन बाद अथवा फूल आने से पहले खेत में पलट देने से मिट्टी में जैविक पदार्थ, नाइट्रोजन और अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ती है। इससे मिट्टी की संरचना मजबूत होती है, लाभकारी सूक्ष्मजीव सक्रिय होते हैं और जलधारण क्षमता में भी सुधार आता है।


कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि हरी खाद के उपयोग से प्रति हेक्टेयर लगभग 40 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन के बराबर पोषक तत्व मिट्टी को प्राप्त हो सकते हैं। इससे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम होती है, मिट्टी में नमी का संरक्षण बेहतर होता है और भूमि की उत्पादकता लंबे समय तक बनी रहती है। धान सहित खरीफ की अन्य फसलों में भी बेहतर वृद्धि और अधिक उत्पादन प्राप्त होता है।

विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि खेत में हरी खाद की फसल पलटने के बाद 15 से 20 दिन तक खेत को खाली छोड़ें, ताकि पौधे पूरी तरह सड़-गलकर मिट्टी में मिल जाएं। इसके बाद धान या अन्य खरीफ फसलों की बुवाई करने से अधिक लाभ मिलता है।

कृषि विज्ञान केंद्र ने किसानों से हर वर्ष खरीफ फसल से पहले कम से कम एक बार हरी खाद का उपयोग करने, वर्षा शुरू होते ही ढैंचा या सनई की बुवाई करने तथा मिट्टी परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाने की अपील की है। इससे खेती की लागत कम होने के साथ-साथ मिट्टी की सेहत में सुधार, पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ कृषि को भी मजबूती मिलेगी।

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