Page Nav

HIDE

Grid

GRID_STYLE

Pages

Classic Header

{fbt_classic_header}

Top Ad

झीरम नरसंहार : 29 मौतें, 13 साल बाद फैसले का इंतजार

यह भी पढ़ें -

11 आरोपियों पर चला मुकदमा, अभियोजन ने पेश किए 101 गवाह; NIA, SIT और दो न्यायिक जांच आयोगों की पड़ताल से जुड़ा मामला जगदलपुर । संवाददाता विमल...

11 आरोपियों पर चला मुकदमा, अभियोजन ने पेश किए 101 गवाह; NIA, SIT और दो न्यायिक जांच आयोगों की पड़ताल से जुड़ा मामला

जगदलपुर। संवाददाता विमलेंदु शेखर झा। छत्तीसगढ़ के इतिहास के सबसे भीषण नक्सली हमलों में शामिल झीरम घाटी नरसंहार के मामले में करीब 13 साल बाद फैसले की घड़ी आ गई है। जगदलपुर स्थित एनआईए कोर्ट में इस मामले में 5 सितंबर को फैसला सुनाया जाना प्रस्तावित है। 25 मई 2013 को दरभा क्षेत्र की झीरम घाटी में हुए घातक नक्सली हमले में कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, वरिष्ठ नेता महेंद्र कर्मा समेत 29 लोगों की मौत हुई थी।

यह हमला उस समय हुआ था, जब कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा झीरम घाटी से गुजर रही थी। घात लगाकर किए गए नक्सली हमले ने प्रदेश की राजनीति को झकझोर दिया था। घटना के बाद सुरक्षा व्यवस्था में चूक से लेकर हमले के पीछे कथित राजनीतिक षड्यंत्र तक कई सवाल उठते रहे। यही वजह रही कि इस मामले की जांच अलग-अलग स्तरों पर हुई और वर्षों तक राजनीतिक बहस का केंद्र बनी रही।

झीरम हत्याकांड से जुड़े मामले में 11 नक्सली आरोपियों के खिलाफ न्यायालय में सुनवाई चली। इनमें से एक आरोपी की मृत्यु हो चुकी है। अभियोजन पक्ष ने अपने मामले के समर्थन में 101 गवाहों के बयान तथा विभिन्न दस्तावेज न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए।

घटना के बाद वर्ष 2013 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने मामले को अपने हाथ में लेते हुए केस दर्ज किया था। मामले का नंबर RC-06/2013/NIA/DLI है। जांच के दौरान एनआईए ने कई वांछित नक्सलियों के संबंध में जानकारी जुटाई।

23 दिसंबर 2023 को एनआईए ने राष्ट्रीय समाचार पत्रों में झीरम घाटी हत्याकांड से संबंधित एक विज्ञापन प्रकाशित कर 19 वांछित नक्सली आरोपियों के नाम और पते सहित जानकारी सार्वजनिक की थी। इस सूची में नक्सली लीडर देवजी का नाम प्रमुखता से शामिल था। इसके अलावा बारसे सुक्का उर्फ देवा का नाम भी सूची में था।

एनआईए ने आम लोगों से इन वांछित नक्सलियों के संबंध में सूचना देने और उनकी गिरफ्तारी में सहयोग करने की अपील की थी तथा उपयोगी सूचना देने वालों के लिए उचित इनाम की घोषणा की थी।

झीरम नरसंहार की जांच को लेकर अब तक दो न्यायिक जांच आयोग गठित किए जा चुके हैं। घटना के बाद वर्ष 2013 में जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की अध्यक्षता में विशेष न्यायिक जांच आयोग का गठन किया गया था। आयोग को सुरक्षा व्यवस्था में चूक, सुरक्षा संबंधी एसओपी, परिवर्तन यात्रा के आयोजकों की भूमिका तथा पुलिस और सुरक्षा बलों के बीच समन्वय जैसे पहलुओं की जांच की जिम्मेदारी दी गई थी।

इसी दौरान केंद्र सरकार ने मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सौंप दी थी। बाद में वर्ष 2018 में प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद राज्य सरकार ने झीरम मामले में कथित राजनीतिक षड्यंत्र की जांच के लिए एसआईटी गठित की। इसके बाद वर्ष 2021 में दूसरे न्यायिक जांच आयोग का गठन किया गया। इस आयोग की जिम्मेदारी जस्टिस सतीश अग्निहोत्री और जस्टिस गुलाम मिन्हाजुद्दीन को सौंपी गई।

झीरम घाटी हमले का मामला केवल न्यायिक जांच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पिछले 13 वर्षों में यह प्रदेश की राजनीति में भी लगातार चर्चा का विषय रहा है। घटना के बाद से ही सुरक्षा में चूक, हमले की परिस्थितियों और कथित राजनीतिक षड्यंत्र को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों की ओर से आरोप-प्रत्यारोप लगाए जाते रहे हैं।

अब जब एनआईए कोर्ट के फैसले का समय करीब आया है, एक बार फिर झीरम नरसंहार की जांच और उसके विभिन्न पहलुओं को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। ऐसे में न्यायालय के फैसले पर पीड़ित परिवारों, राजनीतिक दलों और प्रदेश की जनता की निगाहें टिकी हैं।

13 साल पुराने इस मामले में अब न्यायालय का फैसला यह तय करेगा कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर आरोपों को किस रूप में स्वीकार किया जाता है। हालांकि झीरम नरसंहार से जुड़े व्यापक सवालों और अन्य जांचों के निष्कर्षों को लेकर बहस का सिलसिला फैसले के बाद भी जारी रहने की संभावना है।

No comments